भारत की आजादी की जंग में हर गरीब-अमीर ने अपना खून बहाया था। 15 अगस्त 1947 को आजादी के दिन प्रत्येक व्यक्ति को गर्व था कि आज हम आजाद भारत के नागरिक हैं। अब कोई छोटा-बड़ा नहीं है, सब बराबर हैं, सबके अधिकार बराबर है। हम सब अपने देश के विकास के लिए मिलकर काम करेंगे और भारत को पुन: सोने की चिड़िया बनायेंगे। इस सोच को लेकर यहां विकास योजनाएं बनाई गईं वहां अपने देश के गरीबों के हित में भी विचार हुआ जो सदियों से दमित थे, उन्हें भी देश की मुख्यधारा में लाने के लिए समाज कल्याण के कार्यों में तेजी लाई गई। दलितों को संरक्षण दिया गया। उनके लिए शिक्षा के दरवाजे खोले गये। इन सब कार्यों पर यदि नजर डाली जाए तो आज भी ऐसा लगता है कि जो देश-भक्ति आजादी के समय थी वह इन 65 वर्षों में समाप्त सी हो गई हैं, क्योंकि जो सदियों पहले जाति-पांति का कोढ़ था वहीं बीमारी पुन: जागृति हो गई है। जो आजादी के समय भारतवासी सभी भाई-भाई का नारा लगाते थे, अब वहीं सब राष्ट्रीय एकता भूल गये हैं। प्रत्येक भारतीय को साक्षर बनाना था। गरीब बच्चों को शिक्षा में प्राथमिकता की जरूरत थी। इसलिए 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा नीति बनाई गई, परंतु उच्च वर्ग के दिल में गरीबों के प्रति मानसिक घृणा घर कर गई। उन्होंने उद्योगीकरण को बढ़ावा दिया और दलितों की लगातार अनदेखी की गई।
आज वास्तविकता यह है कि शिक्षा का भी व्यवसायीकरण हो रहा है, जिसमें केवल धनाढय वर्ग के लोग ही स्कूल एवं विश्वविद्यालय खोल रहे हैं, यहां प्रवेश के समय ही हजारों-लाखों रुपये फीस तथा बिल्डिंग फंड के बहाने वसूले जाते हैं। ऐसी स्थिति में गरीबीरेखा के नीचे रह रही जनता अपने बच्चों को इन स्कूलों में कैसे प्रवेश करवा सकती है। आज के वैज्ञानिक युग में शिक्षा मानव जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है। दूर-दराज क्षेत्रों में आज भी प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल नहीं हैं। एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां स्कूल हैं वहां मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई स्कूल टैंटों में चल रहे हैं तो कई पेड़ों के नीचे। बारिश के दिनों में यह स्कूल बंद रहते हैं। कई एक स्कूलों में तो एक ही शिक्षक है तो कहीं बगैर शिक्षक के ही स्कूल चल रहे हैं। इन्हीं कारणों से बड़ी संख्या में छात्र कक्षा 5 तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी स्कूलों में दलितों एवं पिछड़ों के बच्चों की गिनती 87 प्रतिशत और अन्य वर्ग के बच्चों की गिनती 13 प्रतिशत है। ऐसे में निम्न वर्ग के बच्चे दूसरों के साथ कैसे प्रतियोगिता में सामान्य रह सकते हैं। इन परिस्थितियों में मलाई-मार के खाने वाले लोग तरस योग बच्चों से यह आशा करते हैं कि वे भी पब्लिक स्कूलों में बड़े बच्चों का मुकाबला करें, यह मुमकिन नहीं है। देश का विकास तभी होगा जब शिक्षा नीति सबके लिए एक जैसे होगी।
प्रेमदास जस्सल
आज वास्तविकता यह है कि शिक्षा का भी व्यवसायीकरण हो रहा है, जिसमें केवल धनाढय वर्ग के लोग ही स्कूल एवं विश्वविद्यालय खोल रहे हैं, यहां प्रवेश के समय ही हजारों-लाखों रुपये फीस तथा बिल्डिंग फंड के बहाने वसूले जाते हैं। ऐसी स्थिति में गरीबीरेखा के नीचे रह रही जनता अपने बच्चों को इन स्कूलों में कैसे प्रवेश करवा सकती है। आज के वैज्ञानिक युग में शिक्षा मानव जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है। दूर-दराज क्षेत्रों में आज भी प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल नहीं हैं। एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां स्कूल हैं वहां मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई स्कूल टैंटों में चल रहे हैं तो कई पेड़ों के नीचे। बारिश के दिनों में यह स्कूल बंद रहते हैं। कई एक स्कूलों में तो एक ही शिक्षक है तो कहीं बगैर शिक्षक के ही स्कूल चल रहे हैं। इन्हीं कारणों से बड़ी संख्या में छात्र कक्षा 5 तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी स्कूलों में दलितों एवं पिछड़ों के बच्चों की गिनती 87 प्रतिशत और अन्य वर्ग के बच्चों की गिनती 13 प्रतिशत है। ऐसे में निम्न वर्ग के बच्चे दूसरों के साथ कैसे प्रतियोगिता में सामान्य रह सकते हैं। इन परिस्थितियों में मलाई-मार के खाने वाले लोग तरस योग बच्चों से यह आशा करते हैं कि वे भी पब्लिक स्कूलों में बड़े बच्चों का मुकाबला करें, यह मुमकिन नहीं है। देश का विकास तभी होगा जब शिक्षा नीति सबके लिए एक जैसे होगी।
आजादी के इन 65 वर्षों में दलितों को कुछ छुटपुट नौकरियों के अतिरिक्त क्या मिला है। अब तो देश में निजीकरण का दौर है। इस समय गरीबी के उन्मूलन के लिए आम लोगों का जनजागरण करना जरूरी है, ताकि वे अपने बच्चों को उचित शिक्षा दिलाएं क्योंकि दलितों का पिछड़ापन केवल शिक्षाहीनता के कारण ही है। पढ़ने के साथ-साथ रोजगार कमाने के लिए किसी न किसी ट्रेड में प्रशिक्षण भी जरूरी है ताकि पढ़-लिख कर हर नवयुवक कोई न कोई रोजगार कर सके। रोजगार से ही मानव जीवन चलता है। इसके लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति करने के लिए हर राय में कम से कम एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय और देश के हर जिले में डिग्री कॉलेज खोलने का ऐलान किया था। सरकार के इस फैसले से दलितों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। उनका विचार था कि अब निम्न वर्ग के संतों-गुरु रविदास, संत कबीर, संत नामदेव आदि के नाम पर स्कूल-कॉलेज तथा विश्वविद्यालय खोले जायेंगे क्योंकि इन मध्ययुगीन संतों का हिन्दी भाषा के क्षेत्र में एक बहुमूल्य योगदान है। संताें ने जनता के अनुरूप हिन्दी भाषा का प्रयोग करके अपनी समता और समरसता की विचारधारा का प्रसार किया। इन्हीं के योगदान से आज हिन्दी राष्ट्रभाषा का रस ग्रहण कर सकी है। आज विश्व साहित्य के समक्ष यदि कोई काव्य हिन्दी साहित्य का रखा जा सकता है तो वह संत काव्य की सर्वश्रेष्ठ है। परंतु आज तक इन संतों के नाम पर न तो कोई स्कूल-कॉलेज खोले गये हैं न ही इनके सम्मान में सरकार ने आज तक कोई घोषाणा की है। इन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने भक्ति आंदोलन द्वारा भारतीय संस्कृति को विदेशी आक्रांताओं से बचाया था। उन्हें केवल दलितों के महापुरुष मानकर अनदेखी की जा रही है जबकि गुरु रविदास इन संतों के जन थे। इनके जन्म दिवस पर सरकार ने आज तक सार्वजनिक अवकाश की घोषणा भी नहीं की है।
राजनीतिक पार्टियां आज तक दलितों की राजनीति करती रही हैं। परंतु दलित नेताओं ने इनके सम्मुख कभी कोई दलित एजेंडा नहीं रखा है। जब तक बाबू जगजीवनराम इनके संरक्षक रहे, इनके मानवाधिकारों की अनदेखी नहीं हुई। उनके बाद जितने भी दलित नेता आये उनका नाम दलितों से जोड़ा गया परंतु दलितों के लिए जो किया गया आज तक दलितों को नहीं भाया है। आज कोई भ्रष्टाचार की आवाज उठाता है तो कोई ब्लैक मनी की, परंतु दलितों के हित की कोई आवाज नहीं उठाता है। आदिवासियों के विकास के लिए अलग से मंत्रालय बनाया गया और दलितों के लिए क्यों नहीं? हर आम चुनाव से पहले किसी दलित नेता को कोई मंत्रालय देकर यह जताया जाता है कि सरकार दलितों का विकास कर रही है। एक दलित का विकास करके पूरे दलित वर्ग की प्रगति नहीं हो सकती। दलितों का मनोबल तभी बढ़ेगा जब उनके बच्चों को शिक्षा के आधार पर देश की मुख्यधारा में खड़े होने का अवसर मिलेगा। रोजगार से ही गरीबों की रोटी कपड़ा और मकान की भूख मिटेगी और गरीब दूर होगी शिक्षा का उपहार ही दलितों का उध्दार करेगा। इससे ही हमारा देश प्रगतिशील बनेगा।
प्रेमदास जस्सल

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